Mahishasura Mardini Strotam | Aigiri Nandini Lyrics | महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र | Bhakti Sagar Hindi

Mahishasura Mardini Strotam | Aigiri Nandini Lyrics  | महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र | Bhakti Sagar Hindi #AigirNandiniStotram #Mahishasur #Navratri2022

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम 

आयी गिरी नदिनी नदिता मेधिनी
विश्वा विनोदिनी नंदनुथे
गिरीवार विंध्या सिरोधी निवासिनी विष्णू
विलासिनी जिष्णू नठे
   
भगवती हे सिथि कांदा कुडुंबिनी
भूरी कुडुंबिनी भूरी कृते
जया जया ही महिषासुर मर्दिनी
रम्या कपर्दिनी शैला सुठे

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि
दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ् करतोषिणि
किल्बिषमोषिणि घोषरते

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि
दुर्मदरशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब
वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ् गहिमालय
श्रृङ् गनिजालय मध्यगते ।

 मधुमधुरे मधुकैटभगजञ्जिनि
कैटभभज्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड
वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड
पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।

निजभुजदण्ड निपातितखण्ड
विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

अयि रणदूर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्ज
शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव
दूतकृत प्रमथाधिपते ।

दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति
दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर
वीरवराभय दायकरे

त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि
शिरोSधिकृतामल शुलकरे ।

दुमिदुमितामर
धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ् गकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

अयि निजहृकृति मात्रनिराकृत
धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज
समुद्ग॒वशोणित बीजलते ।

शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव
तर्पितभूतपि पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

धनुरनुषङ् ग रणक्षणसङ् ग
परिस्फुरदङ् ग नटत्कटके
कनकपिशङ् ग प्रषत्कनिषङ् ग
रसद्गटश्व॒ङ् ग हताबटुके

कृतचतुरङ् ग बलक्षितिरङ् ग
घटद्वहरङ् ग रटद्वटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

सुरललना ततथेयि तथेयि
कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः
कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।

धुधुकुट धुक्कुट घिंधिमित
ध्वनि धीर मृदङ् ग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

जय जय जप्य जयेजयशब्द
परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिज्झिमि झिङ्कृत
नूपुरशिज्जितमोहित भूतपते

नटित नटार्ध नटी नट नायक
नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

अयि सुमनः सुमन:सुमनः
सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी
रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।

सुनयनविभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक
मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक
झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।

शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण
तल्‍लजपल्‍लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर 
मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि
रूपपयोनिधि राजसुते ।

अयि सुदतीजन लालसमानस
मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति
कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम
केलिचलत्कल हंसकुले

अलिकुलसङ् कुल कुवलयमण्डल
मौलिमिलÐकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

करमुरलीरव वीजितकूजित
लज्जितकोकिल मज्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुजज्जित
रज्जितशैल निकुञ्जगते ।

निजगणभूत महाशबरीगण
सद्रुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि  शैलसुते ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र
मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मीलिमणिस्फुर
दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे

जितकनकाचल मौलिमदोर्जित
निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक
सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक
सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।

सुरथसमाधि समानसमाधि
समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 

पदकमल करुणानिलये
वरिवस्यति योSनुदिन सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये
कमलानिलय: स कथं न भवेत्।

तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो
मम किं न शिवे 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु
षिज्चतितेगुण रङ्गभुवम्‌
भजति स कि न शचीकुचकुम्भ
तटीपरिरम्भ सुखानुभवम्‌।

तव चरणं शरणं करवाणि
नतामरवाणि निवासि शिवम्‌
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं
सकलं ननु कूलयते
किमु  पुरुहूतपुरीन्दु  मुखी
सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

मम तु मतं शिवनामधने
भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि मयि दीन दयालुतया
कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि
यथासि तथानुमितासिरते।

यदुचितमत्र भवत्युररी
कुरुतादुरुता पमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते 

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते 

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